IMA का केंद्रीय जेल में टीबी मुक्त भारत अभियान: कैदियों के लिए लगा विशेष स्वास्थ्य शिविर

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आईएमए सागर का केंद्रीय जेल में टीबी मुक्त भारत अभियान: कैदियों के लिए लगा विशेष स्वास्थ्य शिविर

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सागर। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) सागर शाखा और स्वास्थ्य विभाग सागर के संयुक्त तत्वावधान में सागर की केंद्रीय कारागार में एक महत्वपूर्ण जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।इस विशेष कार्यक्रम में टीबी के संक्रमण, लक्षणों, जांच तथा उपलब्ध मुफ्त उपचार के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम में चिकित्सकों, जेल कर्मियों और जेल प्रशासन की सक्रिय भागीदारी देखी गई, जिससे जेल के अंदर रहने वाले कैदियों और स्टाफ दोनों में टीबी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत में केंद्रीय जेल के उप अधीक्षक ने स्वास्थ्य शिविर में पहुंचे सभी डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों का स्वागत किया। उन्होंने इस तरह की पहल की सराहना करते हुए कहा कि जेल जैसी बंद जगहों में संक्रामक रोगों के प्रसार को रोकने के लिए जागरूकता और समय पर जांच अत्यंत आवश्यक है।

आईएमए सागर शाखा के अध्यक्ष डॉ. तल्हा साद ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए टीबी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि टीबी मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से निकलने वाले बैक्टीरिया (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस) के माध्यम से हवा द्वारा दूसरे व्यक्ति में फैलती है। यह रोग सबसे अधिक फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य अंगों जैसे आंख, रीढ़ की हड्डी, मस्तिष्क, आंत और गर्भाशय को भी प्रभावित कर सकता है। डॉ. साद ने जोर देकर कहा कि टीबी का समय पर पता लगाना और पूर्ण उपचार करवाना अत्यंत जरूरी है, अन्यथा यह गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है।
कार्यक्रम में टीबी के प्रमुख लक्षणों पर भी प्रकाश डाला गया। इनमें दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी, सीने में दर्द या भारीपन महसूस होना, खांसी के साथ खून या बलगम आना, बिना किसी कारण के वजन घटना, लगातार कमजोरी और थकान, हल्का बुखार तथा रात में अत्यधिक पसीना आना शामिल हैं। डॉक्टरों ने उपस्थित सभी को सलाह दी कि यदि इनमें से कोई भी लक्षण दो सप्ताह से अधिक बने रहें तो तुरंत जेल चिकत्सक से जाँच करवाएं।

केंद्रीय जेल के चिकित्सा अधिकारी डॉ. के.के. शाक्य ने लेटेंट टीबी (छिपी हुई टीबी) के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि कई मामलों में टीबी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति संक्रमित होता है लेकिन बीमारी सक्रिय रूप नहीं लेती। इसकी पहचान के लिए Cy-TB जांच सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है। यदि जांच पॉजिटिव आती है तो 12 सप्ताह में कुल 12 खुराक (सप्ताह में एक) का उपचार दिया जाता है, जिससे अगले 18 वर्षों तक सक्रिय टीबी विकसित होने की संभावना लगभग 80% तक कम हो जाती है। डॉ. शाक्य ने कहा कि यह जांच और उपचार जेल जैसे भीड़भाड़ वाले वातावरण में टीबी के प्रसार को नियंत्रित करने में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।

डॉ. जितेंद्र सराफ ने कार्यक्रम में सरकार की राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के अंतर्गत उपलब्ध सुविधाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि टीबी का पूर्ण उपचार DOTS (Directly Observed Treatment Short-course) कार्यक्रम के तहत सरकारी स्तर पर पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध है। उपचार की अवधि सामान्यतः 6 महीने होती है और इसे नियमित रूप से पूरा करना बहुत महत्वपूर्ण है। अधूरा उपचार न सिर्फ रोगी को खतरे में डालता है बल्कि दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB) पैदा कर सकता है, जो उपचार के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण होती है।
कार्यक्रम के दौरान जेल कर्मियों और कैदियों को टीबी से बचाव के उपायों जैसे साफ-सफाई, अच्छा वेंटिलेशन, पौष्टिक आहार और खांसी-छींक के समय मुंह ढकने की सलाह भी दी गई।

यह जागरूकता शिविर सागर जिले में टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक सार्थक कदम साबित हुआ। स्वास्थ्य विभाग और आईएमए के अधिकारियों ने भविष्य में भी जेलों, स्कूलों और सामुदायिक स्तर पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की योजना जताई।

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