सागर विशेष न्यायालय का बड़ा फैसला: नाबालिग से ज्यादती के आरोपी को 20 वर्ष का कठोर कारावास
सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले की विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने एक नाबालिग लड़की के अपहरण और उसके साथ दुष्कर्म करने के मामले में त्वरित सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश श्रीमती नेहा श्रीवास्तव की अदालत ने आरोपी जीवन नागर को दोषी करार देते हुए 20 वर्ष के सश्रम (कठोर) कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई है।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 5 अप्रैल 2024 की है। पीड़िता (उम्र करीब 16 वर्ष) अपनी मां के साथ इलाज कराने के लिए सागर आई थी। शाम करीब 6 बजे सागर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर जब वे ट्रेन का इंतजार कर रही थीं, तब पीड़िता कुछ खाने-पीने का सामान लेने के लिए कैंटीन की तरफ गई। इसी दौरान आरोपी जीवन नागर (उम्र 22 वर्ष, निवासी-राजगढ़) ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर उसे अगवा कर लिया।
जब ट्रेन चली गई और बेटी वापस नहीं लौटी, तो मां ने स्टेशन व रिश्तेदारों के यहां उसकी काफी तलाश की। पीड़िता का मोबाइल भी बंद आ रहा था। इसके बाद पीड़िता की मां ने जीआरपी (GRP) थाना सागर में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की।
मौसी के घर ले जाकर किया दुष्कर्म
पुलिस जांच और कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, आरोपी जीवन नागर नाबालिग लड़की को अगवा कर अपनी मौसी के घर ले गया था। वहां उसने 6 अप्रैल से 7 अप्रैल 2024 के बीच पीड़िता को बंधक बनाकर उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन दुष्कर्म किया।
वैज्ञानिक साक्ष्यों और डीएनए (DNA) रिपोर्ट ने निभाई अहम भूमिका
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सागर जीआरपी पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पीड़िता को दस्तयाब किया और आरोपी को गिरफ्तार किया। पुलिस ने मामले में पुख्ता साक्ष्य जुटाने के लिए पीड़िता और आरोपी के मेडिकल सैंपल (वैजाइनल स्लाइड आदि) एकत्र कर राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) सागर भेजे। विचारण के दौरान अदालत के समक्ष पेश की गई डीएनए (DNA) टेस्ट की पॉजिटिव रिपोर्ट ने आरोपी के खिलाफ अचूक वैज्ञानिक साक्ष्य का काम किया, जिससे आरोपी का बचना नामुमकिन हो गया।
अदालत में आरोपी ने खुद को बताया बेकसूर
सुनवाई के दौरान आरोपी जीवन नागर ने अपने बयानों में खुद को निर्दोष बताते हुए दावा किया कि लड़की अपनी मर्जी से गई थी। हालांकि, आरोपी पक्ष अपने इस बचाव के समर्थन में कोई भी ठोस साक्ष्य या गवाह पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
न्यायालय की कड़ी टिप्पणी और सजा का ऐलान
विशेष लोक अभियोजक श्रीमती रिपा जैन ने अभियोजन पक्ष की ओर से पुरजोर पैरवी की और स्कूल रिकॉर्ड्स व जन्म प्रमाणपत्र के आधार पर यह साबित किया कि घटना के वक्त पीड़िता नाबालिग की श्रेणी में थी।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और डीएनए साक्ष्यों का संज्ञान लेने के बाद आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 3 सहपठित धारा 4 सहित भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366 और 376(1) के तहत दोषी पाया। अदालत ने आरोपी जीवन नागर को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाइ इसके अलावा न्यायालय ने पीड़िता को मानसिक और शारीरिक आघात की क्षतिपूर्ति के लिए 4,00,000/- (चार लाख) रुपये का हर्जाना (प्रतिकर) दिलाने के लिए जिला विधिक सहायता प्राधिकरण को आदेश जारी किया है।


