भाग्योदय ट्रस्ट अस्पताल और डॉ. सर्वेश जैन के बीच जारी विवाद ने अब सिद्धांतों की जंग का रूप ले लिया है।
सागर। पिछले काफी समय से चल रहा यह गतिरोध थमने का नाम नहीं ले रहा, जहां एक ओर अस्पताल प्रबंधन 35 प्रतिशत की कटौती के साथ भुगतान करने पर अड़ा है, वहीं डॉ. सर्वेश जैन टीडीएस के अलावा किसी भी अन्य कटौती को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। हाल ही में इस पूरे मामले पर डॉ. जैन ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए इसे केवल पैसों का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और सिद्धांतों की लड़ाई करार दिया है।
डॉ. सर्वेश का कहना है कि ट्रस्ट की ओर से अभी तक किसी ने भी प्रत्यक्ष रूप से संपर्क नहीं साधा है, हालांकि सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश जरूर आया कि वे किसी भी कार्य दिवस में जाकर अपना चेक ले सकते हैं। इस पर डॉ. जैन का तर्क है कि विवाद खत्म करना आसान है, लेकिन विसंगतियों को स्वीकार करना उन्हें बढ़ावा देने जैसा है। उनका मानना है कि यदि आज इस गलत परंपरा पर चर्चा नहीं की गई, तो यह भविष्य में अस्पताल की ‘आदत’ और फिर ‘संस्कार’ बन जाएगी। डॉ. जैन ने स्पष्ट किया कि जब दो पक्ष पहले से तय नियमों पर काम करते आ रहे हों, तो कोई भी एक पक्ष बिना पूर्व सूचना के शर्तों को मनमाने ढंग से नहीं बदल सकता, भले ही वह अनुबंध मौखिक ही क्यों न हो। वे पहले भी भाग्योदय में सेवाएं देते रहे हैं, जहां अस्पताल अपना शुल्क अलग से लेता था और डॉक्टर की फीस अलग होती थी, लेकिन इस बार अस्पताल प्रबंधन द्वारा डॉक्टर की फीस में से 35 प्रतिशत की कटौती करना उन्हें अनुचित लग रहा है।
इस विवाद के सामाजिक और धार्मिक पहलुओं पर बात करते हुए डॉ. जैन ने सीधे तौर पर जैन साधुओं और दानदाताओं की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उनकी यह मुखरता दरअसल उन लोगों को आईना दिखाने के लिए है जो इस संस्थान को दान देते हैं। उनका आरोप है कि ट्रस्ट में ‘मानव सेवा’ की आड़ में ‘स्व-सेवा’ का खेल चल रहा है। उन्होंने बेंगलुरू के सत्य सांई बाबा ट्रस्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहां पूर्णतः निशुल्क इलाज संभव है, तो अथाह दान प्राप्त करने वाले भाग्योदय अस्पताल में यह क्यों नहीं हो सकता? उनके अनुसार, यदि ईमानदार लोग संस्थान चलाएं तो यहां भी लगभग निशुल्क उपचार मुमकिन है।
खुद के नास्तिक होने के सवाल पर डॉ. सर्वेश ने दोटूक कहा कि नास्तिक होने का अर्थ मानवीय मूल्यों से विमुख होना नहीं है। वे सच्चाई, ईमानदारी और प्रोफेशनलिज्म में अटूट विश्वास रखते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि उनकी मेहनत की राशि वहां फंसी है, इसलिए उन्हें बोलने का पूरा अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गलत व्यवहार को समाज में चर्चा का विषय बनाना अनिवार्य है, क्योंकि चुप्पी साध लेना भी एक प्रकार का पाखंड है। जब तक विसंगतियों पर सवाल नहीं उठेंगे, तब तक समाज और संस्थान बेहतर आचरण के लिए प्रेरित नहीं होंगे। फिलहाल, दोनों पक्षों के अपने-अपने रुख पर कायम रहने से यह विवाद सागर के चिकित्सा और सामाजिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।


