सागर स्मार्ट सिटी के कैमरों की लापरवाही या नंबर प्लेट से छेड़छाड़ का खेल, वाहन मालिक हैरान
सागर। अगर आपके मोबाइल पर अचानक ट्रैफिक चालान का मैसेज आए, तो चौंकिए मत। हो सकता है आपने कोई नियम न तोड़ा हो, लेकिन फिर भी आप स्मार्ट सिटी की इस डिजिटल व्यवस्था के शिकार हो गए हों। सागर स्मार्ट सिटी में इन दिनों एक अजीबोगरीब और परेशान करने वाला कारनामा सामने आ रहा है, जहाँ तकनीकी खामियों और असामाजिक तत्वों की नंबर प्लेट से छेड़छाड़ का खामियाजा आम आदमी भुगत रहा है।

क्या है पूरा माजरा
शहर में लगे हाई-टेक कैमरों का उद्देश्य यातायात व्यवस्था को सुधारना था, लेकिन अब यही कैमरे लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं। शिकायतें मिल रही हैं कि कई वाहन चालक अपनी गाड़ी की नंबर प्लेट के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। वे अपनी गाड़ी पर किसी दूसरे की गाड़ी का नंबर डालकर बेखौफ घूम रहे हैं। जब ये वाहन ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो स्मार्ट सिटी के कैमरे उस नंबर को डिटेक्ट कर लेते हैं और चालान असली मालिक के पास पहुंच जाता है, जिसने कभी उस सड़क पर पैर भी नहीं रखा होता।
स्मार्ट सिटी की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में सागर स्मार्ट सिटी की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं:
वेरिफिकेशन का अभाव: क्या चालान काटने से पहले कंट्रोल रूम में बैठे कर्मचारी वाहन के मॉडल और नंबर का मिलान नहीं करते? अक्सर देखा गया है कि बाइक का चालान कार मालिक के पास पहुंच रहा है।
सॉफ्टवेयर की खामी: नंबर प्लेट पर जमी धूल या मामूली रगड़ को भी सॉफ्टवेयर गलत तरीके से रीड कर रहा है, जिससे ‘8’ को ‘0’ या ‘3’ को ‘9’ समझकर गलत चालान जेनरेट हो रहे हैं।
अपराधियों को बढ़ावा: नंबर प्लेट बदलकर घूमने वाले लोग न सिर्फ ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि किसी बड़ी वारदात को अंजाम देकर बच निकलने का रास्ता भी खोज रहे हैं।
जनता परेशान, जिम्मेदार मौन
शहर के कई नागरिकों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि बिना किसी गलती के चालान भरना न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि इसे रद्द करवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटना मानसिक प्रताड़ना है। “जब हमने नियम तोड़ा ही नहीं, तो हम जुर्माना क्यों भरें यह सवाल आज हर उस व्यक्ति का है जिसके पास गलत चालान पहुंचा है।
सिर्फ वसूली या सुरक्षा भी ?
प्रशासन को समझना होगा कि स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ चालान काटकर राजस्व वसूलना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सटीक व्यवस्था देना भी है। अगर सिस्टम इतना स्मार्ट नहीं है कि वह असली और नकली नंबर प्लेट के बीच का अंतर समझ सके, तो ऐसी तकनीक का क्या लाभ? पुलिस और आरटीओ को चाहिए कि वे सड़क पर उतरकर उन वाहनों की सघन चेकिंग करें जो फर्जी नंबर प्लेट लगाकर घूम रहे हैं, ताकि निर्दोष वाहन चालकों को राहत नसीब हो सके।
स्मार्ट सिटी प्रशासन को अपनी इस अंधी चालान व्यवस्था में तत्काल सुधार करने की जरूरत है। अगर समय रहते नंबर प्लेट से छेड़छाड़ करने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो डिजिटल इंडिया का यह सपना आम जनता के लिए दुःस्वप्न बन जाएगा।


