श्योपुर। भारत में नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो में बसाए जाने के चार साल पूरे हो गए हैं। इस अवधि में चीता पुनर्स्थापना परियोजना ने शुरुआती आशंकाओं के मुकाबले बेहतर परिणाम दर्ज किए हैं। अब तक तीन चरणों में कुल 29 चीते भारत लाए जा चुके हैं। इनमें से 20 चीते वर्तमान में जीवित हैं, जबकि 9 की मौत हुई है। परियोजना की शुरुआत में विशेषज्ञों ने करीब 50 प्रतिशत तक मृत्यु दर का अनुमान जताया था, जबकि अब तक दर्ज मृत्यु दर लगभग 31 प्रतिशत रही है।
इस परियोजना की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत में जन्मे चीता शावकों के जीवित रहने की दर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यहां जन्म लेने वाले शावकों की सर्वाइवल दर करीब 65 प्रतिशत है। यह अफ्रीकी देशों में दर्ज औसत करीब 40 प्रतिशत की दर से अधिक है। भारत में जन्मी दो मादा चीताएं भी कई शावकों को जन्म दे चुकी हैं, जो अब कूनो के जंगल में विचरण कर रहे हैं।
सुरक्षा और निगरानी की संयुक्त रणनीति बनी अहम
कूनो में चीतों की निगरानी के लिए केवल तकनीकी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय मानवीय निगरानी को भी व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया। विशेषज्ञों के शुरुआती आकलन से बेहतर परिणाम मिलने में इस समन्वित निगरानी व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
अफ्रीकी देशों में आमतौर पर मादा चीता के प्रसव के बाद उसे और उसके शावकों को मानवीय हस्तक्षेप से दूर रखा जाता है। कूनो में इसके बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित की गई, जिसमें मादा चीता को परेशान किए बिना शावकों की स्थिति पर नजर रखी जा सके।
कूनो नेशनल पार्क के मुख्य वन संरक्षक उत्तम शर्मा के मुताबिक, प्रसव के समय डेन साइट यानी गुफा के आसपास मानवीय गतिविधि बढ़ने से मादा चीता अपना व्यवहार बदल सकती है। ऐसी स्थिति में उसके स्थान बदलने या शावकों को छोड़ देने का खतरा भी रहता है।
सुरक्षित दूरी से शावकों की निगरानी
कूनो प्रबंधन ने इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए ऐसी निगरानी व्यवस्था अपनाई, जिसमें मादा चीता और उसके शावकों को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए। इसके लिए 100 से अधिक वनरक्षक और ट्रैकर लगातार निगरानी में लगाए गए हैं। इसके अलावा 24 घंटे सीसीटीवी, सैटेलाइट कॉलर से मिलने वाला रियल-टाइम डाटा और ड्रोन की मदद भी ली जा रही है।
व्यवस्था के तहत मादा चीता के प्रसव के तीन-चार दिन बाद जब वह शिकार के लिए बाहर निकलती है, तब टीम सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए शावकों के स्वास्थ्य की जांच कर सकती है। इससे एक ओर लगातार निगरानी संभव हुई, वहीं दूसरी ओर मादा चीता और उसके शावकों को सीधे मानवीय हस्तक्षेप से बचाने की कोशिश भी की गई।
कूनो प्रबंधन अब इस निगरानी व्यवस्था के अनुभवों को एक मैनुअल के रूप में तैयार करने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में जरूरत पड़ने पर दूसरे जंगलों में भी इस तरह की व्यवस्था को अपनाने में मदद करना है।
अफ्रीकी मॉडल से अलग तैयार की गई व्यवस्था
मुख्य वन संरक्षक उत्तम शर्मा के अनुसार, अफ्रीकी क्षेत्रों में मादा चीता के शावकों को जन्म देने के बाद आमतौर पर मानवीय निगरानी से दूर रखा जाता है। कूनो में परिस्थितियों के अनुरूप एक अलग निगरानी प्रणाली विकसित की गई, जिसके जरिए मादा चीता को बिना परेशान किए उसके साथ शावकों पर भी नजर रखना संभव हुआ।
उत्तम शर्मा, मुख्य वन संरक्षक, कूनो नेशनल पार्क, श्योपुर के अनुसार, जहां परिस्थितियां अनुकूल रहीं, वहां प्रबंधन ने कड़ी निगरानी और गैर-हस्तक्षेप के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया। उनके मुताबिक, इसी व्यवस्था के जरिए कूनो में मादा चीताओं और उनके शावकों की निगरानी की गई।








