सागर। पटकुई स्थित कुबेर वाटिका में राधे कृष्णा सत्संग परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन नीलगिरी पीठाधीश्वर आत्मानंद सरस्वती महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भावुकता में कभी भी विवेक नहीं खोना चाहिए। मन को साध लेना ही सबसे बड़ा साधन है। यदि मन एकाग्र हो जाए तो जीवन में किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती।
उन्होंने कहा कि भगवान से संबंध जोड़ने के लिए नामजप, संकीर्तन और पूजा-पाठ का सहारा लेना चाहिए। संसार के मोह-माया से दूर रहकर भक्ति में मन लगाने से जीवन सार्थक होता है। उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थ होता है, वहीं तक दुनिया साथ देती है। इसलिए परिवार में प्रेम, सद्भाव और भगवान के प्रति अटूट आस्था बनाए रखना आवश्यक है।

आत्मानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि भोग और भोजन में संयम रखने से ही भक्ति में मन लगता है। घर के बच्चों और युवाओं को अच्छे संस्कार देना प्रत्येक परिवार की जिम्मेदारी है, क्योंकि वे वही सीखते हैं जो अपने घर में देखते हैं। उन्होंने स्वच्छता, शिक्षा और सदाचार को जीवन का आधार बताते हुए अंधविश्वास और भूत-प्रेत जैसी मान्यताओं से दूर रहने की सीख दी। उन्होंने कहा कि हमेशा परमात्मा पर विश्वास रखें और मन को नामस्मरण में लगाएं।
उन्होंने कहा कि जिस घर में कलह और विवाद होता है, वहां पूजा-पाठ का वातावरण नहीं बन पाता। मनुष्य को अपने दोषों और बुराइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। दान, धर्म, साधना और पूजा ही जीवन में वास्तविक सहायक बनते हैं। उन्होंने आत्मविद्या के महत्व पर बल देते हुए कहा कि न्यायाधीश, इंजीनियर, डॉक्टर या प्रोफेसर बनने के साथ-साथ आत्मज्ञान भी आवश्यक है। धन के साथ दया और करुणा का भाव होना भी उतना ही जरूरी है।
कथा के समापन पर श्रद्धा और उत्साह के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। कथा स्थल को रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया और जन्मोत्सव के दौरान भक्त भाव-विभोर हो उठे। कथा में शिवदास महाराज (गंजबासौदा), मुख्य यजमान पंडित दिनेश शुक्ला एवं पुष्पा शुक्ला, आचार्य पंडित रामकुमार खंपरिया, मधुभाई, दलसुख भाई, चंद्र भूषण तिवारी, प्रकाश गुरु, अजय दुबे, अनुराग प्यासी, जेठा भाई, गौरव टुटेजा, अभिषेक टुटेजा, कुक्कू अवस्थी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।


