जिनवाणी को जीवन में उतारने वाला ही मोक्षमार्ग का प्रथम पात्र : आचार्य विभव सागर
सागर। गौरा बाई दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री 108 विभव सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिनवाणी केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उसे जीवन में आचरण में उतारने के लिए है। भगवान महावीर स्वामी के समवशरण में मुनिराजों को प्रथम स्थान इसलिए प्राप्त है क्योंकि वे भगवान की वाणी को पूर्ण रूप से आत्मसात कर उसी भव से मोक्ष प्राप्त करने की सर्वोच्च पात्रता रखते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि समवशरण में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। प्रत्येक जीव को उसकी आध्यात्मिक योग्यता, साधना और मोक्ष की निकटता के आधार पर स्थान मिलता है। उन्होंने समवशरण की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रथम कोष्ठ में मुनिराज, द्वितीय में कल्पवासी देवियां तथा इसके बाद आर्यिकाएं, श्राविकाएं और अन्य देवियां विराजमान होती हैं।
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने “णमो कोट्ठ बुद्धीणं” मंत्र की व्याख्या करते हुए कोष्ठ बुद्धि ऋद्धि का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक विशाल कोठार में अनेक प्रकार के अन्न सुरक्षित रहते हैं, उसी प्रकार ऋद्धिधारी मुनिराजों की बुद्धि में शास्त्रों, विद्याओं और कलाओं का विशाल ज्ञान समाहित रहता है। आधुनिक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे एक छोटी पेन ड्राइव में हजारों पुस्तकें संग्रहित की जा सकती हैं, वैसे ही महान मुनिराजों की बुद्धि में समस्त शास्त्रों का सार सुरक्षित रहता है।
बीज बुद्धि ऋद्धि का वर्णन करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जिस प्रकार एक छोटा बीज विशाल वृक्ष का रूप ले लेता है, उसी प्रकार जिनवाणी के छोटे-से सूत्र में अनंत ज्ञान और तत्व समाहित रहते हैं। उन्होंने “ॐ” को इसका उदाहरण बताते हुए कहा कि एक अक्षर में भी व्यापक आध्यात्मिक रहस्य निहित है।
धर्मसभा में आचार्य श्री ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया। उन्होंने सभी लोगों से अपने जन्मदिन और मांगलिक अवसरों पर कम से कम एक पौधा लगाने तथा उसके वृक्ष बनने तक संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केवल पौधा लगाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी देखभाल करना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने अपनी रचना की पंक्तियां सुनाते हुए कहा, “अपने-अपने जन्मदिवस पर हम एक पेड़ लगाएं, आओ हम सब मिलकर के पर्यावरण बचाएं।”
आचार्य श्री ने कहा कि वृक्ष प्राणवायु, छाया, फल, औषधि और वर्षा का आधार हैं। एक वृक्ष सौ पुत्रों के समान होता है और वृक्षों की रक्षा करना वास्तव में मानव जीवन तथा आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करना है। चिपको आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जंगलों की रक्षा करना ही अपना मंगल करना है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आचार्य श्री की धर्मदेशना का श्रवण किया।


