बचपन में हुई लापता बेटी 17 साल बाद ऐसे मिली, परिवार ने सागर पुलिस का आभार माना

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बचपन में हुई लापता बेटी 17 साल बाद ऐसे मिली, परिवार ने सागर पुलिस का आभार माना

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सागर। दिनांक 11.02.2008 को चौकी मंडी बामोरा क्षेत्र से 10 वर्षीय नाबालिग बालिका के गुम होने पर परिजन की रिपोर्ट पर गुम इंसान कायम किया गया था। बाद में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार गुमशुदा नाबालिगों के प्रकरण में अपराध दर्ज किए जाने के निर्देश के पालन में थाना बीना में अपराध क्र. 516/2014 धारा 363 IPC पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया।

 

मार्मिक घटना का संक्षिप्त विवरण

साल 2008 में यह बच्ची किसी तरह ट्रेन में बैठकर अहमदाबाद पहुंच गई, जहाँ कुछ सामाजिक संवेदनशील लोगों को वह मिली, जिन्होंने वर्षो तक उसे सुरक्षित रखकर पाला-पोसा और शिक्षा दी। बच्ची अपने नाना-नानी (भोपाल) का स्थान बता पाती थी, इसलिए वे लोग उसे भोपाल भी लेकर पहुँचे, परंतु सटीक पता न मिलने के कारण परिवार का मिलान नहीं हो पाया।

ट्वीटx एकाउंट

कई वर्षों बाद, अब बालिग हो चुकी बालिका ने इंस्टाग्राम पर रील देखते समय एक वीडियो में मंडीबामोरा रेलवे स्टेशन का बोर्ड देखा, जिसे देखकर उसकी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उसने यह बात अपने पति को बताई और दोनों ने मंडीबामोरा पुलिस चौकी से संपर्क किया।

चौकी प्रभारी एवं स्टाफ ने इस संवेदनशील मामले को अत्यधिक गंभीरता से लेते हुए बच्ची और उसके पति को मंडीबामोरा बुलाया व परिवार की खोज कर उन्हें चौकी पर बुलाया। इस दौरान बच्ची अपने माता-पिता को पहचान नहीं पाई, किंतु पिता ने बेटी को देखते ही उसके माथे पर पुराने चोट के निशान के आधार पर पहचान लिया।

यह मिलन का क्षण अत्यंत भावुक और मार्मिक रहा—सभी की आँखें नम हो गईं और परिवारजन व उपस्थित लोग रो पड़े। परिवार ने पुलिस प्रशासन का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सुखद क्षण है।

इस उल्लेखनीय कार्य में विशेष भूमिका

एस डी ओ पी बीना नीतेश पटेल के निर्देशन व निरीक्षक नितिन पाल के मार्गदर्शन में
उप निरीक्षक प्रदीप कुमार

उप निरीक्षक निशांत भगत प्रधान आरक्षक सुशील सिंह चौहान, आरक्षक रवि भदौरिया, आरक्षक रोहित, आरक्षक गजेन्द्र, प्रधान आरक्षक चालक बनवारी लाल पटेल, महिला आरक्षक निधि पटेल

पुलिस की संवेदनशीलता और सतर्कता का उत्कृष्ट उदाहरण

यह कार्यवाही पुलिस की मानवता, संवेदनशीलता एवं कर्तव्यपरायणता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिससे यह सिद्ध होता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, आशा का दीप कभी नहीं बुझता।

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