इस्तीफा ही अंत नहीं, जवाबदेही की शुरुआत! आंदोलन में कथित राष्ट्रविरोधी घुसपैठ

सागर। आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। यह केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं, बल्कि उस जनदबाव की स्वीकारोक्ति है जो पिछले कई सप्ताह से देशभर के छात्रों ने लोकतांत्रिक तरीके से बनाया। जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे हजारों छात्रों के लिए यह एक बड़ी जीत है, लेकिन यह जीत जितनी छात्रों की है, उतनी ही लोकतंत्र की भी है। हालांकि टॉप जांच एजेंसियों ने सरकार को अलर्ट किया हैं छात्र आंदोलन में देश विरोधियों अवसरवादी ताक़तों की घुसपैठ का इनपुट अलर्ट बार बार जारी होने की ख़बर थी।

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे में लिखा कि उन्होंने पहले दिन से जिम्मेदारी ली, जांच कराई, दोबारा परीक्षा कराई और वे नहीं चाहते कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो या राष्ट्रविरोधी ताकतें इस माहौल का फायदा उठाएं। यह एक जिम्मेदार संदेश है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी ही थी तो यह फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया? जब आंदोलन लगातार फैल रहा था, देशभर के छात्र सड़कों पर थे और सरकार पर सवाल उठ रहे थे, तब समय रहते संवाद और राजनीतिक जवाबदेही दिखाई जाती तो शायद हालात यहां तक नहीं पहुंचते।

लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं होती। छात्र अपनी मेहनत, भविष्य और अवसरों की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे थे। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी जन आंदोलन की आड़ में यदि कोई अराजक या राष्ट्रविरोधी तत्व घुसने की कोशिश करे तो उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो। लेकिन ऐसे तत्वों की मौजूदगी पूरे छात्र आंदोलन की भावना को कमजोर नहीं करती। सरकार की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ वास्तविक आंदोलनकारियों से संवाद बनाए रखने की भी होती है।

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संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह संदेश भी महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में “टकराव नहीं, संवाद होना चाहिए।” यह केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए सीख है। जब संवाद समाप्त होता है, तब सड़कें संसद का विकल्प बनने लगती हैं।

साल 2014 के बाद देश ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, विदेश नीति और कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय परिवर्तन देखे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय लेने और जनता की भावनाओं को समझने में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई दी। मजबूत सरकार की पहचान केवल बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि समय पर सही फैसले लेने से होती है।

भारतीय राजनीति में कभी किसी बड़ी प्रशासनिक विफलता के बाद मंत्री नैतिक आधार पर पद छोड़ देते थे। पिछले कुछ वर्षों में यह परंपरा कमजोर पड़ती दिखी। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उस राजनीतिक संस्कृति की याद दिलाता है, जिसमें जवाबदेही केवल विपक्ष की मांग नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा होती है।

यह इस्तीफा अंत नहीं है। असली परीक्षा अब शुरू होती है। क्या शिक्षा व्यवस्था में स्थायी सुधार होंगे? क्या परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी बनेगी? क्या पेपर लीक और परीक्षा माफिया पर निर्णायक कार्रवाई होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भविष्य में किसी संकट के समय सरकार पहले संवाद करेगी या फिर आंदोलन के चरम पर पहुंचने का इंतजार?

लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा आधार बहुमत नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। विश्वास तभी मजबूत होता है जब सरकार समय पर संवाद करे, जवाबदेही स्वीकार करे और गलतियों से सीख लेकर व्यवस्था में सुधार करे। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक राजनीतिक घटना भर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी भी है। अब देश की निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेती है।

गजेंद्र ठाकुर✍️

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