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बुधनी वन भूमि कांड: 78,700 सागौन के पौधे गायब, शिवराज के धरने के बाद जांच रिपोर्ट सामने आई

By: गजेंद्र ठाकुर•
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बुधनी वन भूमि कांड: 78,700 सागौन के पौधे गायब, शिवराज के धरने के बाद जांच रिपोर्ट सामने आई

बुधनी वन भूमि अतिक्रमण मामला: जांच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, 78 हजार से ज्यादा सागौन के पौधे काटने का दावा

31.48 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई; शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे कार्तिकेय के धरने के बाद मुख्यमंत्री ने दिए थे जांच के आदेश

सीहोर/भोपाल। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी वन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के दौरान आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने का मामला अब जांच रिपोर्ट के बाद नए मोड़ पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल को सौंपी गई रिपोर्ट में वन भूमि पर अतिक्रमण, सागौन के पौधों की कटाई और कब्जाधारियों के पहले से पक्के मकान होने का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वन विकास निगम की जमीन पर कब्जा कर झोपड़ियां बनाई गई थीं और खेती की जा रही थी।

मामले में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे कार्तिकेय सिंह प्रभावित परिवारों के धरने में शामिल हुए थे। अधिकारियों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए जाने और मुख्यमंत्री को जानकारी दिए जाने के बाद जांच के निर्देश जारी हुए थे। इस बीच वन विकास निगम के डिपो के बाहर प्रभावित परिवारों का धरना मंगलवार को तीसरे दिन भी जारी रहा।

2021 में लगाए गए थे 3.37 लाख सागौन के पौधे

जांच रिपोर्ट के मुताबिक, भैरूंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र की कोसमी बीट स्थित रिजर्व फॉरेस्ट के कंपार्टमेंट नंबर 426 में वन विकास निगम की 31.48 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया।

– वर्ष 2020 में 186.960 हेक्टेयर वन भूमि सामान्य वनमंडल से वन विकास निगम के सीहोर परियोजना मंडल को हस्तांतरित की गई थी।

– वर्ष 2021 में निगम ने इस क्षेत्र के 135 हेक्टेयर हिस्से में 3,37,500 सागौन के पौधे लगाए थे।

– रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से 78,700 पौधे काट दिए गए और 31.48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर लिया गया।

– गूगल अर्थ की टाइमलाइन तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2021 तक संबंधित कंपार्टमेंट खाली था।

2022 में झोपड़ियां बनाकर खेती शुरू करने का आरोप

रिपोर्ट में उल्लेख है कि वर्ष 2022 में सुनील, पिता शैतान, और अन्य 11 लोगों ने कथित तौर पर पौधारोपण को नुकसान पहुंचाकर वन भूमि पर अस्थायी झोपड़ियां बना ली थीं। इसके बाद संबंधित क्षेत्र में खेती की जाने लगी।

जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह कब्जा वन विकास निगम की जमीन के 31.48 हेक्टेयर क्षेत्र में किया गया था। हालांकि, इन तथ्यों और आरोपों के संबंध में संबंधित पक्षों का विस्तृत जवाब सामने आना भी मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

नौ कब्जाधारियों के पक्के मकान होने का उल्लेख

कलेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि 11 अक्टूबर को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हटाए गए नौ कब्जाधारियों के सिंहपुर और हबीबनगर में पहले से पक्के मकान होने की जानकारी मिली। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित मकानों के नंबर और वोटर आईडी कार्ड का विवरण भी दर्ज है।

भैरूंदा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमिहीन होने का दावा करने वाले इन लोगों के मूल गांवों में पक्के मकान मौजूद हैं। प्रशासन ने इसी आधार पर प्रभावित परिवारों के भूमिहीन होने के दावों पर सवाल उठाए हैं।

नौ झोपड़ियां हटाईं, ड्रोन से हुई वीडियोग्राफी

रिपोर्ट के अनुसार, 11 अक्टूबर को की गई कार्रवाई में नौ झोपड़ियां हटाई गईं। मौके पर मौजूद एक अवैध कुएं को मिट्टी और मुरम से भर दिया गया। प्रशासन ने पूरी कार्रवाई की ड्रोन से वीडियोग्राफी भी कराई।

प्रशासन का पक्ष है कि कार्रवाई वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए की गई। वहीं, मकान टूटने से प्रभावित परिवारों के मामले में उनके पुनर्वास, आवास और अन्य दावों से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

शिवराज सिंह चौहान के हस्तक्षेप के बाद जांच

इस मामले ने उस समय राजनीतिक तूल पकड़ लिया, जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे कार्तिकेय सिंह प्रभावित परिवारों के धरने में शामिल हुए। शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल को फोन पर मामले की जानकारी दी थी।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए। अब शासन को सौंपी गई रिपोर्ट में वन भूमि पर अतिक्रमण और सागौन के पौधों की कटाई से जुड़े तथ्य सामने रखे गए हैं।

अब इन सवालों पर रहेगी नजर

जांच रिपोर्ट के बाद मामले में मुख्य सवाल यह है कि वन भूमि पर कब्जे और पौधों की कटाई के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है। साथ ही, जिन परिवारों की झोपड़ियां हटाई गईं, उनके आवास और पुनर्वास से जुड़े दावों पर प्रशासन क्या निर्णय लेता है।

वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना और वन संपदा की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्रवाई के दौरान प्रभावित परिवारों के दावों, पात्रता और लागू कानूनी प्रावधानों का निष्पक्ष परीक्षण भी जरूरी है। शासन की आगे की कार्रवाई से स्पष्ट होगा कि इस पूरे मामले में प्रशासनिक जिम्मेदारी और प्रभावित परिवारों के सवालों का समाधान किस तरह किया जाता है।

गजेंद्र ठाकुर

By: गजेंद्र ठाकुर

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