पुलिस जनसुनवाई का मंगल उदय: पदभार लेते ही एक्शन में दिखे नए माइक वन

जनसुनवाई में माइक वन साहब: जब कुर्सी को उसका असली वारिस मिला

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सागर। पुलिस कंट्रोल रूम में बीते मंगलवार कुछ अजीब सा हुआ। अजीब यह कि जनसुनवाई के मंच पर वही चेहरा नजर आया, जिसका नाम पट्टिका पर लिखा था। बीते दो सालों से जिले के फरियादी जिन माइक वन (पुलिस अधीक्षक साहब) की उपस्थिति को किसी दुर्लभ खगोलीय घटना की तरह देखते थे, इस बार वे साक्षात वहां विराजमान थे।

रूटीन का चमत्कार

हमारे देश में विडंबना देखिए कि जब कोई अधिकारी केवल अपनी जिम्मेदारी—यानी अपनी तय कुर्सी पर बैठकर जनता को सुन भर ले—तो इसे तेजतर्रार कार्यप्रणाली का तमगा दे दिया जाता है। सच तो यह है कि नए कप्तान आईपीएस अनुराग सुजानिया ने कोई रॉकेट साइंस नहीं किया, उन्होंने बस उस रूटीन को जीवित किया जो फाइलों की धूल में दब चुका था।
जब कप्तान खुद मैदान में हो, तो अधीनस्थों की फाइलों की रफ्तार और जुबान की कड़वाहट अपने आप कम हो जाती है।

अनेक बॉस वाली संस्कृति पर प्रहार

सागर पुलिस की एक पुरानी और दुखद विशेषता रही है कि यहाँ बॉस एक नहीं, अनेक रहे हैं। पुलिस अधीक्षक के अलावा कुछ रसूखदार राजनेता, स्वयंभू RTI एक्टिविस्ट और सिस्टम के दलाल भी खुद को वर्दी का भाग्यविधाता समझते रहे हैं। अमले का एक हिस्सा अपनी समस्याओं के लिए विभाग के दरवाजे के बजाय इन बाहरी मुख्यालयों पर मत्था टेकना ज्यादा मुफीद समझता था।

लेकिन नए कप्तान की सीधी संवाद शैली ने इन समानांतर सत्ता केंद्रों को एक कड़ा संदेश दिया है। जब मुखिया खुद जनसुनवाई में बैठकर दूध का दूध और पानी का पानी (और रागद्वेष वाले 20% मामलों की छंटनी) करने लगे, तो बिचौलियों की दुकानें बंद होना लाजमी है।

दागदार दामन और तबादलों का गणित

अब सबसे बड़ा सवाल अमलें के ट्रांसफर-पोस्टिंग के उस खेल पर है, जिसमें बाहरी हस्तक्षेप किसी दीमक की तरह विभाग को चाटता रहा है।

क्या अब भी सिफारिशी और दागदार अमले को मलाईदार थाने मिलेंगे?
क्या विभाग पर बट्टा लगाने वाले खास सिपहसालारों को फिर से मौका मिलेगा?

फिलहाल की तस्वीर तो यही कहती है कि साहब ने लगाम कस ली है। देखना यह है कि यह सक्रियता केवल पदभार ग्रहण का उत्साह है या फिर सागर पुलिस की कार्यसंस्कृति में आने वाले एक स्थायी वसंत की आहट।

गौरतलब हो कि जनता को सुपरमैन नहीं चाहिए, उन्हें बस एक ऐसा पुलिस अधीक्षक चाहिए जो उपलब्ध हो और सुनता हो। अगर कप्तान साहब ने बाहरी हस्तक्षेप,  कानाफूसी, कान भरने वाला के रिमोट कंट्रोल को तोड़ दिया, तो यकीन मानिए सागर की पुलिसिंग के अच्छे दिन वाकई आ गए हैं।

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