चमत्कारों की धरा: जालंधर की सिद्ध तांत्रिक शक्ति पीठ मां ज्वालादेवी का अद्भुत रहस्य

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चमत्कारों की धरा: जालंधर की सिद्ध तांत्रिक शक्ति पीठ मां ज्वालादेवी का अद्भुत रहस्य

सागर। सागर में अदभुत सिद्ध तांत्रिक शक्ति पीठ ज्वालादेवी जी का मंदिर खुरई से 29 किमी दूर ग्राम जलंधर में स्थित है। मंदिर विंध्यगिरी पर्वत माला की श्रृंखला में लगभग 750 फीट ऊंचाई पर है। सुरखी विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले जलंधर गांव स्थित यह शक्ति पीठ अति प्राचीन है। यहां जाने के लिए आपको सबसे पहले जरुवाखेड़ा रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड पर उतरना पड़ेगा। यहां से चांदामऊ, लुहर्रा गांव होते हुए मां ज्वाला देवी के दरबार तक पहुंचा जा सकता है। यह शक्ति पीठ तंत्र साधना से जुड़े लोग खास महत्व रखता है।

देवी की प्रतिमा अद्वितीय विलक्षण

शक्ति पीठ पर अति प्राचीन देवी जी की प्रतिमा की कृति एवं भव्यता आश्चर्य चकित करती है। लगभग साढ़े तीन फीट ऊंची मा देवी ज्वाला देवी जी की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में दो शेरों पर सवार हैं। पीछे नौ देवियों के चित्र अंकित हैं। मूर्ति के बायी ओर श्री गणेश जी की विलक्षण प्रतिमाए है। ज्वाला देवी जी की नवीन मूति प्राण प्रतिष्ठा वर्ष 1987 में की गई है।

ये है मान्यता

जनश्रुति के अनुसार यहां पहले एक गांव बसा था, जिसमें शखों का नाद होता था। वहां से फूटे हुए मिट्टी के बर्तन, शंख के टुकड़े यत्र तत्र पड़े मिल जाते हैं। बाद में यह जंगल के रूप में परिवर्तित हो गया। एक किमी की दूरी पर छत्रसाल महाराज की अटारी अवशेष रूप में है। जनश्रुति के अनुसार महाराज छत्रसाल प्रत्येक नवरात्रि में यहां आकर मां की उपासना किया करते थे। मंदिर से कुछ ही दूरी पर मंजीरा घाटी पड़ती है जहां मजीरा बाबा के नाम से प्रसिद्ध स्थान है। यहां पर पत्थरों को आपस में ठोकने से मंजीरों जैसी मधुर पूर्व आवाज निकलती है।

पौराणिक दृष्टि से जिस समय दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती ने अपने शरीर की आहुति दी थी उस समय भगवान श्री शिवशंकर ने अधजले शरीर को लेकर मंत्र-तंत्र भ्रमण किया था। सती के जहां-जहां शरीर के अंग गिरे वे सभी सिद्ध शक्ति पीठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। मां ज्वाला देवी अपने भक्तों के मनोरथ तत्काल पूर्ण करती हैं। श्रद्धालुओं का जमघट साल भर एवं क्वार की नवरात्रि एवं चौत्र की नवरात्रि में विशेष जन सैलाव उमड़कर अपनी मनोकामना पूर्ण हेतु माँ ज्वाला देवी के दर्शन करने आते हैं, एवं मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः दर्शन करते आते हैं।

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