डॉ.गौर विवि में जाति प्रमाणपत्र विवाद में प्रोफेसर निलंबित
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के बिजनेस मैनेजमेंट विभाग के प्रोफेसर डॉ. श्री भागवत को अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्ति हासिल करने से जुड़े आरोपों के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। डॉ. भागवत स्कूल ऑफ कॉमर्स एंड मैनेजमेंट के डीन पद पर भी कार्यरत थे।
विश्वविद्यालय की ओर से 7 अगस्त को जारी आदेश के अनुसार, डॉ. भागवत की नियुक्ति 16 अप्रैल 2005 को अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित लेक्चरर पद पर हुई थी। उनके एससी प्रमाण पत्र को लेकर शिकायत मिलने के बाद 30 जुलाई को फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने 5 अगस्त को अपनी रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपी।
रिकॉर्ड जांच में उठे सवाल
विश्वविद्यालय के आदेश में कहा गया है कि कमेटी की जांच में प्रथम दृष्टया डॉ. भागवत की नियुक्ति एससी आरक्षित पद पर होने की बात सामने आई, लेकिन रिकॉर्ड में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध स्थायी एससी प्रमाण पत्र नहीं मिला। प्रस्तुत प्रमाण पत्र का संबंधित जारीकर्ता प्राधिकारी के रिकॉर्ड से सत्यापन भी नहीं हो सका।
सत्यापन रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया डॉ. भागवत के उत्तर प्रदेश की बिंद समुदाय से संबंधित होने की बात सामने आने का उल्लेख है, जिसे वहां ओबीसी श्रेणी में बताया गया है। कमेटी ने आशंका जताई कि एससी आरक्षण के आधार पर नियुक्ति गलत जाति दावे के आधार पर प्राप्त की गई हो सकती है और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की।
जांच पूरी होने तक निलंबन
रिपोर्ट पर विचार के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने डॉ. श्री भागवत को केंद्रीय सिविल सेवा नियमों के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय विश्वविद्यालय सागर रहेगा और वे सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे।
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के प्रथम दृष्टया निष्कर्षों के आधार पर की गई है। अंतिम निर्णय अनुशासनात्मक जांच पूरी होने के बाद विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा लिया जाएगा।
डॉ. भागवत ने कार्रवाई को बताया द्वेषपूर्ण
निलंबन पर डॉ. श्री भागवत ने कार्रवाई को बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताया है। उनका कहना है कि वे विश्वविद्यालय में हो रही गड़बड़ियों और गलतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि महज आठ दिनों में जांच से लेकर निलंबन तक की प्रक्रिया पूरी कर दी गई और उनका पक्ष तक नहीं सुना गया।
फिलहाल इस मामले में विश्वविद्यालय की अनुशासनात्मक जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि डॉ. भागवत की नियुक्ति को लेकर लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं और उनके खिलाफ अंतिम कार्रवाई क्या होती है।

