मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक दुष्कर्म मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। मामले में कराई गई डीएनए जांच में यह सामने आया कि रेप पीड़िता से जन्मे बच्चे का जैविक पिता वह व्यक्ति नहीं था, जिसे इस मामले में दुष्कर्म का दोषी ठहराया गया था। वैज्ञानिक जांच के इस निष्कर्ष को अदालत ने मामले के अन्य साक्ष्यों की तुलना में अधिक विश्वसनीय माना।
जस्टिस देवनारायण मिश्रा की अदालत ने 17 सितंबर को अपना फैसला सुनाते हुए सिवनी सेशंस कोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में वैज्ञानिक रिपोर्ट पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों की तुलना में अधिक भरोसेमंद प्रतीत होती है।
डीएनए जांच में नहीं मिला आरोपी और बच्चे का मेल
मामले की जांच के दौरान फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट सामने आई। इसमें पीड़िता, नवजात बच्चे और आरोपी के ब्लड सैंपल से प्राप्त डीएनए की जांच की गई। रिपोर्ट में मां और बच्चे के बीच डीएनए का मिलान पाया गया, लेकिन आरोपी और नवजात के डीएनए में कोई मेल नहीं मिला।
अदालत ने इस वैज्ञानिक रिपोर्ट को मामले का अहम साक्ष्य माना। कोर्ट के मुताबिक, आरोपी के डीएनए का बच्चे से मेल नहीं होना उसके खिलाफ लगाए गए दुष्कर्म के आरोप को कमजोर करता है।
जिरह के दौरान पीड़िता ने बदला बयान
मामले में पीड़िता ने पुलिस के सामने दिए बयान और बाद में अदालत में आरोपी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। हालांकि, जिरह के दौरान उसने अपने बयान में बदलाव किया। उसने कहा कि उसकी मां ने ही उसे उस व्यक्ति का नाम लेने के लिए कहा था।
घर में जबरन घुसने के आरोप पर भी सवाल
अभियोजन पक्ष की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि आरोपी जबरन पीड़िता के घर में दाखिल हुआ था। हालांकि, अदालत के सामने किसी भी गवाह ने इस बात की पुष्टि नहीं की।
इसके विपरीत, गवाहों ने बताया कि आरोपी का पीड़िता के घर आना-जाना पहले से था। इन परिस्थितियों और डीएनए रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने सिवनी सेशंस कोर्ट की ओर से सुनाई गई 10 साल की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को मामले से बरी कर दिया।


