भाई की सरकारी नौकरी बहन के हक पर भारी नहीं: एमपी हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

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भाई की सरकारी नौकरी बहन के हक पर भारी नहीं: एमपी हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

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इंदौर। सरकारी सेवा में कार्यरत किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति अब केवल कागजी रिश्तों के आधार पर तय नहीं की जा सकेगी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि यदि मृत कर्मचारी का कोई भाई सरकारी नौकरी में है, लेकिन वह अलग रहता है और परिवार पर आश्रित नहीं है, तो केवल इसी वजह से बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
देवास के बैंक नोट प्रेस से जुड़ा मामला
यह प्रकरण देवास स्थित बैंक नोट प्रेस के एक कर्मचारी से जुड़ा है, जिनकी सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। उनके निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। कुछ समय बाद कर्मचारी की पत्नी का भी देहांत हो गया, जिससे उनकी बेटी पूरी तरह असहाय स्थिति में आ गई। पारिवारिक हालात को देखते हुए विभाग ने उसे अनुकंपा आधार पर जूनियर ऑफिस असिस्टेंट के पद पर नियुक्त किया था।
कुछ महीनों बाद क्यों हुई बर्खास्तगी
नियुक्ति के कुछ माह बाद ही विभाग ने आदेश जारी कर सेवा समाप्त कर दी। तर्क यह दिया गया कि याचिकाकर्ता का बड़ा भाई पहले से सरकारी नौकरी में है, इसलिए परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित माना जाएगा। विभाग ने बिना किसी विस्तृत जांच के यह मान लिया कि अनुकंपा नियुक्ति नियमों का उल्लंघन हुआ है।
बहन ने अदालत में रखी सच्चाई
मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां याचिकाकर्ता ने बताया कि उसका भाई वर्षों से अलग रह रहा है। उसका अपना परिवार और अलग खर्च हैं। वह न तो पिता पर कभी निर्भर रहा और न ही बहन के भरण-पोषण में उसकी कोई भूमिका रही। केवल भाई होने और सरकारी सेवा में होने से उसे परिवार का सहारा मान लेना वास्तविक स्थिति के विपरीत है।
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
इंदौर खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से राहत देना है, न कि परिवार में नौकरी करने वालों की संख्या गिनना। यदि कोई सदस्य अलग रहता है और आश्रित नहीं है, तो उसके सरकारी कर्मचारी होने से परिवार की आर्थिक स्थिति अपने आप मजबूत नहीं मानी जा सकती।
प्रशासनिक लापरवाही पर सख्त रुख
कोर्ट ने विभागीय रवैये पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि बिना उचित जांच, तथ्यों के मूल्यांकन और वास्तविक पारिवारिक हालात को समझे सेवा समाप्त करना गंभीर प्रशासनिक चूक है। केवल फाइलों में दर्ज रिश्तों के आधार पर किसी का भविष्य तय नहीं किया जा सकता।
क्या दिया गया आदेश
हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए बहन को उसके पद पर पुनः बहाल करने के निर्देश दिए। साथ ही सेवा में निरंतरता, बर्खास्तगी अवधि का वेतन और सभी संबंधित लाभ देने का आदेश भी पारित किया गया।
फैसले का व्यापक असर
यह निर्णय उन अनेक मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां केवल यह कहकर अनुकंपा नियुक्ति रोक दी जाती थी कि परिवार में कोई सरकारी कर्मचारी मौजूद है। अब विभागों को यह साबित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में मृत कर्मचारी के परिवार का आर्थिक सहारा है या नहीं।
अदालत का स्पष्ट संदेश
हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति का फैसला नियम पुस्तिकाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि परिवार की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य संवेदनहीन प्रशासन नहीं, बल्कि संकट में फंसे परिवार को न्याय दिलाना है।

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