आबकारी विभाग की ढुलमुल कार्यप्रणाली: शराब दुकानों के 12वें चरण के निष्पादन में फिर वही पुराना ढर्रा
सागर। जिले में शराब दुकानों के आवंटन को लेकर आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। निष्पादन के 11 चरण बीत जाने के बाद भी विभाग अब तक शत-प्रतिशत दुकानों का निपटारा नहीं कर पाया है, जिसके चलते अब 12वें चरण की घोषणा करनी पड़ी है। जानकारों का मानना है कि विभाग की ‘वेट एंड वॉच’ (ठहरो और देखो) वाली सुस्त नीति के कारण न केवल राजस्व का नुकसान हो रहा है, बल्कि शराब ठेकेदारों में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
नए दिशा-निर्देश: ऑक्शन खत्म, अब केवल ई-टेंडर का सहारा।
अपनी ढुलमुल छवि को सुधारने की कोशिश में विभाग ने इस बार प्रक्रिया में बदलाव किया है। अब ऑक्शन (नीलामी) को पूरी तरह बंद कर केवल ई-टेंडर के माध्यम से आवंटन का निर्णय लिया गया है। विभाग को उम्मीद है कि इस बदलाव से प्रक्रिया में गति आएगी, लेकिन सीमित समय और जटिल शर्तों को देखते हुए इसकी सफलता पर अभी भी संशय बरकरार है।
नियमों का पेंच और ठेकेदारों की बेरुखी
आलोचना इस बात की भी हो रही है कि विभाग आरक्षित मूल्य को लेकर लचीला रुख नहीं अपना पा रहा है। जारी निर्देशों के अनुसार:
बोली की सीमा: टेंडर में ऑफर प्राइस आरक्षित मूल्य के 70% से कम नहीं हो सकती।
समूहों का पुनर्गठन: राजस्व बढ़ाने के लिए समूहों को फिर से गठित करने की बात कही गई है, जिसे लेकर विभाग की जिला समिति पर ‘देरी से निर्णय’ लेने के आरोप लग रहे हैं।
पुराना होल्ड: पिछले चरणों में जिन ठेकेदारों के ऑफर 80% से नीचे होने के कारण होल्ड पर रखे गए थे, उन्हें राहत देते हुए दोबारा EMD जमा करने से छूट तो दी गई है, लेकिन उनकी फाइलों का समय पर निराकरण न होना विभाग की सुस्ती को दर्शाता है।
समय-सारणी: क्या दो दिनों में सुधरेगी व्यवस्था?
विभाग ने इस बार बेहद कम समय देते हुए निम्नलिखित कार्यक्रम घोषित किया है:
02 अप्रैल (सुबह 11:00 बजे): ऑनलाइन फॉर्म डाउनलोड और सबमिट करने की शुरुआत।
03 अप्रैल (दोपहर 2:00 बजे): आवेदन जमा करने की अंतिम समय-सीमा।
03 अप्रैल (दोपहर 2:05 बजे): ई-टेंडर खोलने का निर्धारित समय।
दरअसल सागर आबकारी विभाग के पास अब केवल कुछ ही घंटे शेष हैं यह साबित करने के लिए कि वह अपनी सुस्त कार्यप्रणाली से बाहर निकलकर समय पर दुकानों का निष्पादन कर सकता है। यदि 12वें चरण में भी विभाग लक्ष्य से पीछे रहता है, तो यह शासन के राजस्व लक्ष्यों के लिए एक बड़ा झटका होगा।
आबकारी विभाग और ठेकेदारों के बीच बढ़ता गतिरोध !
सूत्र बताते हैं कि सागर जिले में शराब ठेकों की नीलामी प्रक्रिया में ठेकेदारों की बेरुखी ने प्रशासनिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है। विभाग और कारोबारियों के बीच तालमेल की कमी अब स्पष्ट रूप से धरातल पर दिखने लगी है।
रुचि में कमी: बार-बार निविदाएं (टेंडर) आमंत्रित किए जाने के बावजूद, ठेकेदार आगे नहीं आ रहे हैं। इसका मुख्य कारण विभाग द्वारा तय की गई महंगी बेस प्राइज और पिछले वर्षों का घाटा बताया जा रहा है।
अघोषित शर्तें और दबाव: ठेकेदारों का आरोप है कि विभाग व्यावहारिक समस्याओं को समझने के बजाय केवल राजस्व लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव बना रहा है, जिससे व्यापार ‘घाटे का सौदा’ साबित हो रहा है।
अवैध शराब की चुनौती: जिले के कई क्षेत्रों में अवैध शराब की बिक्री पर लगाम न कस पाना भी ठेकेदारों के उत्साह को कम कर रहा है। उनका मानना है कि जब तक समानांतर अवैध बाजार बंद नहीं होता, वैध ठेकों से मुनाफा कमाना कठिन है।
इस पूरी प्रक्रिया में यह भी सामने आया
एमपी आबकारी नीलामी: तकनीकी गड़बड़ी या ‘डिजिटल मैच फिक्सिंग’? सूत्रों ने उठाए गंभीर सवाल
मध्यप्रदेश में शराब ठेकों की नीलामी के दौरान हुए हाई वोल्टेज ड्रामे ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। विभागीय सूत्रों के हवाले से बेहद चौंकाने वाली खबरें सामने आ रही हैं कि 31 मार्च की रात आबकारी पोर्टल का अचानक क्रैश होना कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा हो सकता है। मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि जैसे ही बड़े सिंडिकेट्स को चुनौती मिलने लगी और बोली की कीमतें बढ़ने लगीं, वैसे ही कथित तौर पर सर्वर को ‘हथियार डालने’ के निर्देश दे दिए गए ताकि नए और छोटे ठेकेदार अपनी अंतिम बोली दर्ज न करा सकें।
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ा खेल खेला गया है क्योंकि पोर्टल बंद होने के बावजूद कुछ खास समूहों की ‘हाईएस्ट बिड’ के आंकड़े पहले से ही हवा में तैर रहे थे। सवाल यह उठ रहा है कि जब डिजिटल मैदान ही बंद था तो गोल किसने और कैसे कर दिया। सूत्रों की मानें तो विभाग के तकनीकी वेंडर और कुछ प्रभावशाली शराब माफियाओं के बीच सांठगांठ की आशंका है, जिसके चलते ऐन मौके पर सिस्टम को ‘भावनात्मक’ बनाकर बिगाड़ दिया गया।
इस कथित ‘सस्पेंस थ्रिलर’ के बाद अब प्रदेश भर के ठेकेदारों में जबरदस्त उबाल है। सूत्रों के अनुसार, हताश ठेकेदारों का एक बड़ा गुट अब इस पूरी प्रक्रिया को ‘डिजिटल लुका-छिपी’ करार देते हुए इसे चुनौती देने के लिए कानूनी रास्ता अपनाने की तैयारी कर रहा है।


