विशेष रिपोर्ट: खाकी में भेदभाव की संस्कृति—क्या सच में कुछ ही पुलिसकर्मी सुपर हैं?

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विशेष रिपोर्ट: खाकी में भेदभाव की संस्कृति—क्या सच में कुछ ही पुलिसकर्मी सुपर हैं?

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सागर। पुलिस विभाग में भर्ती की प्रक्रिया सबके लिए समान है, प्रशिक्षण एक जैसा है और वर्दी का रंग भी एक ही है। लेकिन सागर पुलिस में पिछले लंबे समय से एक अजीबोगरीब धारणा जड़ें जमा चुकी है। यहाँ विभाग दो हिस्सों में बंटा नजर आता है—एक सुपर कॉप और दूसरे साधारण कर्मचारी। आलम यह है कि कुछ चुनिंदा सिपाही और हवलदार सालों से बडे थानों और विशेष टीमों के नाम पर जमे भी रहें हैं, जबकि बाकी केवल रवानगी और ड्यूटी के फेर में उलझे रहते हैं।

क्या है सुपर कॉप का तिलस्म?

तथाकथित सुपर कॉप उन कर्मचारियों को कहा जाता है जिनका इलाके में नेटवर्क तगड़ा होता है और बदमाशों के बीच जिनकी मुखबिरी सटीक मानी जाती है। लेकिन इस खासियत के पीछे का सच कुछ और भी देखने मिलता है।

नेटवर्क या साठगांठ?- एक ही थाना क्षेत्र या शहर के विभिन्न थानों में वर्षों तक जमे रहने के कारण इन कर्मचारियों का अपराधियों से सीधा संपर्क हो जाता है।

नेताओं का संरक्षण- स्थानांतरण होने पर राजनेताओं से सेटिंग कर यथावत बने रहना या लाइन हाजिर होने के बाद जुगाड़ से पुनः मनपसंद थाने में तैनाती पाना इनकी कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है।
अनाधिकृत टीमों का दबदबा- अक्सर किसी केस को सुलझाने के लिए विशेष टीमें (स्कॉट) बनाई जाती हैं। केस सुलझने के बाद भी ये टीमें भंग नहीं होतीं और एसपी, एएसपी के नाम पर फील्ड में अपना सिक्का जमाए रखती हैं।

अधिकारियों के चहेते और रोटेशन का अभाव

हैरानी की बात यह है कि पुराने थाना प्रभारियों के चहेते कर्मचारी नए आने वाले प्रभारियों के भी प्रिय बन जाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि नए अधिकारी मेहनत करने के बजाय बने-बनाए सिस्टम और पुराने मुखबिर तंत्र पर निर्भर रहना पसंद करते हैं। इससे विभाग के कर्मठ और नए प्रतिभावान सिपाहियों को अपनी काबिलियत दिखाने का अवसर ही नहीं मिल पाता।

विभाग के लिए यह व्यवस्था केसी

किसी भी अनुशासित बल में सुपर कॉप जैसी धारणा संगठन की एकता को कमजोर करती है। जब चंद लोग ही सिस्टम पर हावी हो जाते हैं, तो अन्य कर्मचारियों में हीनभावना पैदा होती है।

अपराधियों से साठगांठ ?

लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने से पुलिस और अपराधियों के बीच मदद का रिश्ता बन जाता है, जो न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा हैं, रोटेशन प्रणाली लागू न होने से योग्य सिपाही केवल फाइलें ढोने तक सीमित रह जाते हैं, मौखिक आदेशों पर चलने वाली व्यवस्था जवाबदेही को खत्म करती है।

विशेषज्ञ की राय

पुलिस विभाग में सुपर कॉप जैसा कुछ नहीं होता। सभी योग्यता के आधार पर भर्ती होते हैं। यह कुछ थाना प्रभारियों की गलतफहमी और आलस्य है कि वे कुछ खास सिपाहियों को ही तेज मान लेते हैं। यह एक कुप्रथा है जिसे रोटेशन प्रणाली से ही खत्म किया जा सकता है। पुलिस मुख्यालय के नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए ताकि किसी की भी अपराधियों से साठगांठ न हो सके। सबको अपनी योग्यता दिखाने का बराबर अवसर मिलना चाहिए— राकेश तिवारी, सेवानिवृत्त डीएसपी

आम राय सामने आई- अगर सागर पुलिस प्रशासन को समाज में अपनी छवि सुधारनी है, तो उसे चहेतों की इस फौज को तोड़कर एक निष्पक्ष कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी। वर्दी का सम्मान तभी बना रहेगा जब हर जवान खुद को सुपर महसूस करेगा, न कि सिर्फ वे जो सेटिंग में माहिर हैं, हालांकि कुछ माह से सागर में सुधार होते देखा जा रहा है जिस तरह से लोकल में तबादले की सूचियां सामने आ रही हैं उससे साफ जाहिर हैं वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पर तवज्जो देना शुरू किया हैं जो विभाग के साथ समाज हित में भी हैं।

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