व्यापमं घोटाला फिर सुर्खियों में: सुप्रीम कोर्ट ने मांगी जांच और चार्जशीट की पूरी जानकारी

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व्यापमं घोटाला फिर सुर्खियों में: सुप्रीम कोर्ट ने मांगी जांच और चार्जशीट की पूरी जानकारी

भोपाल। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। करीब 13 साल पहले पीएमटी समेत कई भर्ती परीक्षाओं में सामने आए इस बड़े फर्जीवाड़े पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मामले के व्हिसल ब्लोअर और पूर्व विधायक पारस सकलेचा की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और राज्य शासन को निर्देश दिया है कि वे अब तक की जांच और दाखिल चार्जशीट का विस्तृत ब्यौरा शपथ पत्र के साथ पेश करें।

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इस मामले की सुनवाई 23 मार्च को हुई थी। कोर्ट के इस आदेश के बाद उन लोगों की चिंता बढ़ गई है, जो पहले इस घोटाले में आरोपित या संदेह के दायरे में रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि दोबारा गहराई से जांच होती है, तो कई बड़े नाम फिर से घेरे में आ सकते हैं।

2014 से उठ रहे सवाल, लंबी कानूनी लड़ाई

पारस सकलेचा ने वर्ष 2014 में ही इस मामले को लेकर विस्तृत शिकायत की थी। उन्होंने 300 से ज्यादा पन्नों के दस्तावेज एसटीएफ और सीबीआई को सौंपे थे।

जब जांच में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल 2026 को तय की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा, विपुल तिवारी और इंद्रदेव सिंह ने पक्ष रखा।

2013 में सामने आया था बड़ा खुलासा

व्यापमं घोटाले का खुलासा सबसे पहले 2013 की पीएमटी परीक्षा में हुआ था। उस समय जांच में सामने आया कि असली अभ्यर्थियों की जगह दूसरे लोग परीक्षा दे रहे थे।

तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुरुआती जांच एसटीएफ को सौंपी थी। बाद में व्हिसल ब्लोअर्स की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंप दी।

इस मामले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, व्यापमं के अधिकारी, निजी कॉलेज संचालक, बिचौलिए, सॉल्वर और कई अभ्यर्थियों को आरोपी बनाया गया था। कई गिरफ्तारियां भी हुई थीं।

2007 तक फैली मिली गड़बड़ियां

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि फर्जीवाड़ा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं था। पीएमटी के अलावा पुलिस आरक्षक, परिवहन आरक्षक और संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में भी अनियमितताएं मिलीं।

बताया गया कि पीएमटी परीक्षा में अकेले करीब 900 अभ्यर्थियों ने गड़बड़ी की, जिनमें से 300 से ज्यादा मामले 2013 की परीक्षा से जुड़े थे। आगे की जांच में यह फर्जीवाड़ा 2007 तक पीछे जाता हुआ पाया गया।

शिकायत में उठाए गए अहम सवाल

सकलेचा ने अपनी शिकायत में जांच की दिशा को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कार्रवाई मुख्य रूप से छोटे स्तर के लोगों—जैसे अभ्यर्थी और उनके परिजनों—तक सीमित रही, जबकि बड़े अधिकारियों और निजी मेडिकल कॉलेज संचालकों से पर्याप्त पूछताछ नहीं की गई।

इसके अलावा शिकायत में यह भी कहा गया कि निजी मेडिकल कॉलेजों और व्यापमं के कई अधिकारियों को जांच में पक्षकार नहीं बनाया गया। 2009 से 2012 के बीच हुए फर्जीवाड़े में शामिल कई छात्रों पर भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया गया है।

नौ साल तक कार्रवाई का इंतजार

सकलेचा ने 11 दिसंबर 2014 को एसटीएफ द्वारा जारी विज्ञापन के आधार पर अपनी शिकायत दस्तावेजों के साथ दर्ज कराई थी।

बाद में जून 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के आदेश के बाद उन्होंने 14 जुलाई 2015 को सीबीआई मुख्यालय, दिल्ली में 320 पन्नों की विस्तृत शिकायत सौंपी।

सीबीआई ने फरवरी 2016 में और एसटीएफ ने 2015 व 2019 में उनके बयान दर्ज किए। इसके बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने 2023 में फिर हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे अप्रैल 2024 में यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि वे सीधे तौर पर प्रभावित पक्ष नहीं हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद इस बहुचर्चित घोटाले में एक बार फिर नई दिशा में जांच की संभावना बन गई है।

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