बीएमसी में वेंटिलेटर सपोर्ट और टीमवर्क ने दी दो महिलाओं को नई जिंदगी

बीएमसी में वेंटिलेटर सपोर्ट और टीमवर्क ने दी दो महिलाओं को नई जिंदगी

सागर। बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के एनेस्थीसिया विभाग ने अपनी कार्यकुशलता और टीमवर्क से चिकित्सा जगत में एक मिसाल पेश की है। हाल ही में शुरू हुए एनेस्थीसिया आईसीयू के परिणाम बताते हैं कि यदि डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ का जज्बा मजबूत हो, तो गंभीर से गंभीर मरीज को भी मौत के दरवाजे से वापस लाया जा सकता है।

दो ‘चमत्कारिक’ रिकवरी की कहानी

अस्पताल प्रशासन ने हाल ही में दो ऐसे मामले साझा किए जहाँ मरीजों की हालत बेहद चिंताजनक थी: पहला मामला (देवरी से रेफर मरीज): जुबैदा (परिवर्तित नाम) को डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण बीएमसी रेफर किया गया था। अस्पताल पहुँचते समय वह ‘हेपेटिक इंसेफेलोपेथी’ (लिवर की खराबी के कारण बेहोशी) की स्थिति में थी। उन्हें तत्काल सीपेप वेंटिलेटर पर लिया गया। टीम के प्रयासों से मात्र तीन दिनों में उनकी स्थिति में सुधार आया और अब वह पूर्णतः स्वस्थ होकर चल-फिर रही हैं। दूसरा मामला (दमोह से रेफर मरीज): सरस्वती रानी (नाम परिवर्तित) को अनियंत्रित बीपी, मिर्गी के झटके और गहरी बेहोशी की हालत में भर्ती कराया गया था। उन्हें दो दिनों तक कृत्रिम सांस पर रखा गया, जिसके बाद उनकी स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ।

एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. सर्वेश जैन ने इस सफलता का श्रेय अपनी टीम को दिया है। जूनियर डॉक्टर्स किसी भी अस्पताल की रीढ़ होते हैं। डॉ. मोहम्मद इलयास और डॉ. दीपक गुप्ता के नेतृत्व में जूनियर डॉक्टर्स की टीम ने जो लगन दिखाई, उसी का परिणाम है कि आज हमारे आईसीयू के नतीजे इतने शानदार आ रहे हैं।

बीएमसी डीन डॉ पीएस ठाकुर ने कहा कि गंभीर मरीजों के इलाज में वेंटिलेटर की भूमिका केवल सांस देना नहीं है, बल्कि यह शरीर को वह समय प्रदान करता है जिसमें दवाएं असर कर सकें और शरीर खुद को हील (स्वस्थ) कर सके। इन दोनों ही मामलों में स्त्री रोग विभाग के डॉक्टरों ने प्राथमिक देखभाल सुनिश्चित की, जिसके बाद आईसीयू टीम ने कमान संभाली।

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