सागर। जिले की बीना विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित विधायक निर्मला सप्रे से जुड़े दलबदल मामले में मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने एमपी हाईकोर्ट जबलपुर के समक्ष अपनी स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। यह रिपोर्ट नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा दायर याचिका के जवाब में दाखिल की गई है।
इस मामले में शुक्रवार 27 फरवरी को सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन किसी कारणवश सुनवाई नहीं हो सकी। अब अदालत ने अगली सुनवाई मार्च के अंतिम सप्ताह में निर्धारित की है।
स्पीकर के अधिकार क्षेत्र पर जोर
विधानसभा सचिवालय की ओर से दायर रिपोर्ट में कहा गया है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत किसी विधायक की अयोग्यता तय करने का विशेषाधिकार विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को प्राप्त है। रिपोर्ट में अदालत से अनुरोध किया गया है कि जब तक अध्यक्ष द्वारा अंतिम निर्णय नहीं दिया जाता, तब तक न्यायालय को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
समय-सीमा को लेकर क्या कहा गया
सचिवालय ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि दलबदल कानून के मामलों में निर्णय लेने के लिए कोई निर्धारित वैधानिक समय-सीमा तय नहीं है। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के ‘कीशम मेघचंद्र’ मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि तीन महीने में निर्णय लेने संबंधी टिप्पणी एक मार्गदर्शक सुझाव था, न कि हर मामले में लागू होने वाला बाध्यकारी नियम।
साथ ही यह भी कहा गया कि वर्तमान परिस्थिति में ऐसा कोई आपात या तात्कालिक कारण नहीं है, जिससे तत्काल निर्णय देना आवश्यक हो।
कार्यवाही जारी, नोटिस जारी किए गए
स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित विधायकों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों पर निर्धारित नियमों के तहत प्रक्रिया चल रही है। उत्तरदाताओं को नोटिस जारी किए जा चुके हैं और उनके जवाब प्राप्त होने के बाद साक्ष्यों की जांच की जा रही है। सचिवालय ने कहा कि कार्यवाही सक्रिय रूप से जारी है और इसे अधूरा या निष्क्रिय नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख
रिपोर्ट में ‘कीशम मेघचंद्र’ प्रकरण के अलावा ‘पाडी कौशिक रेड्डी’ मामले का भी संदर्भ दिया गया है। सचिवालय का तर्क है कि जब तक ऐसी स्थिति न हो, जहां कार्यकाल समाप्ति के कारण निर्णय का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाए, तब तक अदालत को शीघ्रता से आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं होती।
‘देरी’ का आरोप अस्वीकार
सचिवालय ने कहा है कि चूंकि विधानसभा का कार्यकाल अभी शेष है, इसलिए अयोग्यता से जुड़ी कार्यवाही को विलंबित नहीं माना जा सकता। Disqualification Rules, 1986 के तहत सभी औपचारिक प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है।
प्रत्येक मामला अलग: न्यायिक विवेक का प्रयोग
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि हर अयोग्यता प्रकरण के तथ्य अलग होते हैं, इसलिए किसी अन्य मामले से इसकी तुलना उचित नहीं है। अध्यक्ष वर्तमान मामले में अपने विवेक और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं।
याचिका निरस्त करने की मांग
विधानसभा सचिवालय ने अदालत से अनुरोध किया है कि चूंकि प्रक्रिया अभी प्रचलन में है और याचिकाकर्ता द्वारा किसी ठोस कानूनी उल्लंघन का उल्लेख नहीं किया गया है, इसलिए याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि फिलहाल केवल स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई है। यदि अदालत निर्देश देती है तो विस्तृत बिंदुवार जवाब भी प्रस्तुत किया जाएगा।
उमंग सिंघार ने लगाया था देरी का आरोप
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि कुछ विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर विधानसभा अध्यक्ष जानबूझकर निर्णय लेने में देरी कर रहे हैं। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि अध्यक्ष को एक तय समय-सीमा के भीतर फैसला देने का निर्देश दिया जाए।
अब इस मामले की अगली सुनवाई मार्च के अंतिम सप्ताह में होगी, जहां अदालत विधानसभा सचिवालय के जवाब और याचिकाकर्ता के तर्कों पर विचार करेगी।


