तिब्बती बौद्ध श्रद्धालुओं ने दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की 32वीं वर्षगांठ मनाई, बांटे गर्म कपड़े
मप्र(सागर)।10 दिसंबर को तिब्बती बौद्ध श्रद्धालुओं ने दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की 32वीं वर्षगांठ मनाई गयी मप्र के सागर में गर्म कपड़े बेचने आए तिब्बती शरणार्थियों ने इस उपलक्ष्य पर विशेष पूजा की पारंपरिक परिधानों और अपनी संस्कृति को जीवंत रूप में संजोये तिब्बती समुदाय ने एक दूसरे को बधाई दी इस दिन अपनी सारी दुकाने समय के पहले बंद कर तिब्बती लोग अपने विभिन्न आयोजनों में शामिल हुए और स्थानीय घरोना आश्रम पहुँचकर तिब्बती लोगो ने वहाँ मौजूद बच्चों और बड़ो को भी गर्म ऊनि कपड़े बांटे

आज के दिन तिब्बती समुदाय ने शांति दिवस के रूप में हर्षोल्लास से मनाया इसमें दलाई लामा की लंबी आयु के लिए प्रार्थना की गई। बौद्ध धर्म के धर्म गुरु दलाईलामा को 10 दिसंबर 1989 को शांति नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था। दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को पूर्वोत्तर तिब्बत के तक्तेसेर क्षेत्र में रहने वाले एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम ल्हामो थोंडुप था जिसका अर्थ है मनोकामना पूरी करने वाली देवी बाद में उनका नाम तेंजिन ग्यात्सो रखा गया। उन्हें मात्र दो साल की उम्र में 13वें दलाई लामा थुबटेन ज्ञायात्सो का अवतार बताया गया था छह साल की उम्र में ही मठ के अंदर उनको शिक्षा दी जाने लगी,दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है, जिसका मतलब होता है- ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करुणा, अवलोकितेश्वर के बुद्ध के गुणों के प्रकट रूप माने जाते हैं। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो।
खबर- गजेंद्र ठाकुर-9302303212